बिज़नेस सूत्र

देवदत्त पट्टनाइक
12/10/2015 5:48 PM

इस बेहद दिलचस्प किताब में कहानियाँ, भाव और विचारों को जगाने वाले तत्त्व मौजूद हैं I बिज़नेस सूत्र ऐसी दुर्लभ प्रबंधन पुस्तक है जिसमें गहराई है, और यह बोझिल नहीं है I यह रोचक होने के साथ 

ही मनोरंजक भी है I 

पुस्तक का मुख्य आधार है कि यदि हम मानते हैं कि समृद्धि का पीछा किया जाना चाहिए, तो कार्यस्थल रणभूमि यानी निवेशकों, नियामकों, नियोक्ताओं, कर्मचारियों, विक्रेताओं, प्रतिद्वंदियों  और ग्राहकों की युद्धभूमि बन जाता है; यदि हमारी धारणा है कि समृद्धि को आकर्षित किया जाना चाहिए, तो कार्यस्थल रंगभूमि बन जाता है, यानी ऐसी जगह जहाँ सभी प्रसन्न रहते हैं I

पुरणविद्या का ज्ञान प्रबंधकों व् अग्रणियों व् ग्राहकों के व्यव्हार को बेहतर ढंग से समझने मैं सहायक होता है I आखिर पुराणविद्या मानव मस्तिष्क को ही व्यक्त करती है I

लक्ष्य से अवधारणा तक - सब कुछ हमारी मान्यताओं पर निर्भर करता है : व्यक्तिपरक सत्य का लेंस, जो उस दुनिया को समझने में हमारी मदद करता है I

व्यवसाय यज्ञ की तरह है, एक ऐसा अनुष्ठान जिसका वर्णन सबसे पुराने, सबसे पूजनीय हिंदू शास्त्र ऋग्वेद में किया गया है I 

आर्थिक वृद्धि बौद्धिक व् भावनात्मक विकास की और नहीं ले जाती; वह बस भय का विस्तार कर सकती है I ऋषियों ने देखा कि निजी विकास के बिना आर्थिक वृद्धि विनाशकारी हो सकती है I वे इस बात से आश्वस्त थे कि आर्थिक वृद्धि बौद्धिक व् भावनात्मक विकास का परिणाम होना चाहिए I

मनुष्य की भूख अनोखी है I 

मैक्स मूलर ने कैथेनोथिस्टिक शब्द का प्रयोग हमारी मान्यताओं के लिए किया, जिसका अर्थ है हर एक देवता को आवाहन के समय बारी-बारी से सर्वोच्च देवता मन जाता है I दूसरे शब्दों में, सन्दर्भ या परिस्तिथि देवता के दर्जे को निर्धारित करती थी I

केवल अंधेर नगरी में ही हर किसी को एक जैसा समझा जाता है I  उनके बीच मौजूद अंतर को कोई महत्व नहीं दिया जाता I  केवल इंसान ही ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं I प्रकृति में शारीरिक अंतर से फर्क पड़ता है I 

हम अपरिचित को समझने के बजाय उस पर प्रभुत्व रखना चाहते हैं, उसे अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं या फिर उसे नष्ट करना चाहते हैं I हम मान लेते हैं कि जो कुछ हम जानते हैं, वह वस्तुनिष्ठ सत्य है बाक़ी सब कुछ खतरा है I 

हम समस्याओं का समाधान चाहते हैं, लेकिन दिव्य-दृष्टि विकसित करने से मना कर देते हैं या फिर यह नहीं समझ पाते कि हम केवल वस्तुगत विश्व को बदलना चाहते हैं और इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि व्यक्तिपरक दुनिया को बेहतर बनाने की ज़रुरत नहीं है I 

बाज़ार भयभीत करने वाली जगह है I हमें धोखाधड़ी व् शोषण से डर लगता है I हम चाहते हैं की कोई हमें सुरक्षित व् वांछित महसूस करवाए I कोई हो जो हमें आँकने के बजाय हमारा अनुमोदन करे I हम चाहते हैं कि कोई हमें खुश रखे I कर्मचारी अपने नियोक्ता का व्यक्तिगत ध्यान चाहता है; खरीदार विक्रेता का पूरा ध्यान चाहता है I  हम वन के कृष्ण की चाह रखते हैं, जो एक व्यक्ति को भूलने के लिए सामूहिक का बहाना नहीं करता I

सच्चे अर्थ में विस्तार तभी होता है, जब मेरी वृद्धि तुम्हारी वृद्धि के कारन होती है I केवल मेरी वृद्धि होना स्वार्थ है I

हम यह मानना चाहते हैं कि प्रशिक्षण कार्यक्रम लोगों को हमेशा के लिए बदलकर रख देगा, लेकिन ऐसा होता नहीं है I

अंततः हर यज्ञ समाप्त होता है I  संस्कृति की स्थापना करने के लिए मानवता जिस अग्नि व् जल का उपभोग करती है, वही अंततः उसका उपभोग करती है I 

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