Momin

Momin

Author : Momin Khan Momin; Compiler - O.P Sharma

In stock
Rs. 145
Classification Poetry
Pub Date Paperback
Imprint Manjul
Page Extent 140
Binding Paperback
Language Hindi
ISBN 978-93-89143-58-4
In stock
Rs. 145
(inclusive all taxes)
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about book

'मोमिन' कि कल्पना शक्ति अत्यन्त कोमल है और उनकी शाइरी में जिस प्रकार की उपमाओं को प्रयोग मिलता है, वे बहुत उच्च स्तर की हैं। उनकी भाषा में कुछ ऐसे गुण विद्यमान हैं, जो उनके प्रत्येक शे'र में दिखाई देते हैं। हकीम मोमिन ख़ां 'मोमिन' मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन थे।
जो पहले दिन से ही दिल का कहा न करते हम
तो अब ये लोगों की बातें सुना न करते हम

अगर न दाम में ज़ुल्फ़ें सियह के आ जाते
तो यूं ख़राब ओ परीशां रहा न करते हम

अगर न लगती चुप उस बदगुमां की शोख़ी से
तो बात-बात में मुज़्तर हुआ न करते हम

अगर जलाते न उस शोला रू के इश्क़ में जी
तो सोज़े आतिशे ग़म से जला न करते हम

उस आफ़ते दिल ओ जां पर अगर न मर जाते
तो अपने मरने की हरदम दुआ न करते हम

न भरते दम जो किसी शोला रू की ख़्वाहिश का
तो ठंडी सांस हमेशा भरा न करते हम

अगर न आंख तग़ाफ़ुल शआर से लगती
तो बैठे-बैठे ये यूं चौंक उठा न करते हम

न होश खोते अगर उस परी की बातों पर
तो आप ही आप ये बातें किया न करते हम

अगर न हंसना हंसना किसी का भा जाता
तो बात-बात पे यूं रो दिया न करते हम

About author

हकीम मोमिन ख़ां 'मोमिन' का जन्म सन 1800 में दरिया गंज, दिल्ली के कूचा चेलां में हुआ था। घर में इनका नाम हबीब उल्लाह रखा गया था, परन्तु पिता की शाह अब्दुल अज़ीज़ के प्रति अपार श्रद्धा के कारण और उनके कहने पर ही इनका नाम 'मोमिन' रख दिया गया।
'मोमिन' ख़ां ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शाह अब्दुल क़ादिर ख़ां की देख-रेख में हाशिल की। 'मोमिन' ख़ां ने भी जवानी में कदम रखते ही अपने पिया से हिकमत की शिक्षा लेना आरम्भ कर दिया। इसलिए आप भी दिल्ली के नामी-गिरामी हकीम बन गये।
हिकमत के अलावा 'मोमिन' एक महँ ज्योतिषी भी थे। इनके ज्योतष ज्ञान का पता उनकी इस भविष्यवाणी से हो जाता है। उन्होंने अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि पांच हफ़्ते, पांच महीने अथवा पांच बरस में मेरा चोला छूट जायेगा और यही हुआ भी। इस भविष्यवाणी करने के ठीक पांच महीने बाद ही आपका निधन हो गया।
ज्योतिष होने के अलावा 'मोमिन' शतरंज के एक बहुत उम्दा खिलड़ी भी थे। तत्कालीन दिल्ली में उनका नाम कुछ नामवर खिलाड़ियों में गिना जाता था। खेलने बैठते थे, तो दीन-दुनिया को भूल जाते थे।
'मोमिन' को शे'रो शाइरी का शौक़ बचपन से ही था। प्रारम्भ में वह शाह नसीर से इस्लाह लिया करते थे, परन्तु बाद में वह अपने कलाम को ख़ुद ही ठीक करने लगे। अपने इसी फ़न के कारण उनका नाम देश के नामी शाइरों में शामिल हो गया।