Zauq

Zauq

Author : Ibrahim Zauq; compiler OP Mishra

In stock
Rs. 125
Classification Poetry
Pub Date September 2019
Imprint Manjul
Page Extent 110
Binding Paperback
Language Hindi
ISBN 978-93-89143-59-1
In stock
Rs. 125
(inclusive all taxes)
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about book

शेख़ मोहम्मद इब्राहिम 'ज़ौक़' का शुमार उर्दू भाषा के उस्ताद शाइरों में किया जाता है। जिन दिनों दिल्ली में अकबर शाह ने 'ज़ौक़' को 'ख़ाकान ए हिन्द' की उपाधि देकर सम्मानित किया, उस समय 'ज़ौक़' की आयु मात्र उन्नीस बरस थी। बाद में उन्हें 'मलिक उल शुआरा' उपाधि भी प्रदान की गयी। हालांकि 'ज़ौक़' का रंग-रूप सांवला था और उनके चेहरे पर चेचक के दाग़ भी थे, परन्तु अपने पहनावे, अपनी चाल-ढाल तथा मुशाइरों में अपनी ऊंची और खनकदार आवाज़ में ग़ज़ल पढ़कर वह जनता का दिल लूटने में सफल हो जाते थे।
'ज़ौक़' की ग़ज़लों को पढ़ने से यह सिद्ध हो जाता है कि मज़्मूनों का नयापन, ज़बान की मिठास, मुहावरों का कसैलापन और इन सबका उचित प्रयोग उनके कलाम की विशेषताएं हैं। 'ज़ौक़' की शाइरी में अलंकारों का विशेष स्थान है, लेकिन फिर भी उनकी शाइरी की ज़बान आम आदमी की ज़बान लगती है।
'ज़ौक़' की शाइरी आज भी लब्धप्रतिष्ठ मानी जाती है। इस बात का प्रमाण 'ज़ौक़' का यह शे'र है -
लाई हयात आए, क़ज़ा ले चली चले।
अपनी ख़ुशी न आए, न अपनी ख़ुशी चले।

या फिर ये शे'र -
एहसान नाख़ुदा के उठाये मेरी बला।
कश्ती ख़ुदा पे छोड़ दूँ, लंगर को तोड़ दूं।

उसी उस्ताद शाइर की चुनिन्दा ग़ज़लें हमने इस संकलन में एकत्र की हैं, जिन्हें पढ़कर आप भी 'ज़ौक़' की क़लम का लोहा मान जायेंगे।

About author

मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़ (1789-1854) उर्दू अदब के एक मशहूर शायर थे। इनका असली नाम शेख़ इब्राहिम था। ग़ालिब के समकालीन शायरों में ज़ौक़ बहुत ऊपर का दर्जा रखते हैं। वे आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और राजकवि थे और मिर्ज़ा ग़ालिब से उनकी प्रतिद्वंदिता प्रसिद्ध है। अंत में इस कमाल के उस्ताद ने 1271 हिजरी (1854 ई।) में सत्रह दिन बीमार रहकर परलोक गमन किया। मरने के तीन घंटे पहले यह शे’र कहा था: कहते हैं ‘ज़ौक़’ आज जहां से गुज़र गया क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत करे।